काश! सामान्य वर्ग घोषित हो जाता लावारिस तो पढ़ाने पर नहीं करने होते लाखों का खर्च

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||संजीव कुमार सिंह ||
मैं असमंजस में हॅूं। बच्चों को पढ़ाएं की नहीं ?क्योंकि मैं सामान्य वर्ग से हूॅं। आरक्षण पीड़ित हूॅं। कारण यह है कि पढ़ाने पर लाखों का खर्च आता है। 90 प्रतिशत से उपर अंक आने पर भी नौकरी मिलती नहीं है। जबकि आरक्षण वर्ग को 30 प्रतिशत से उपर आने पर ही नौकरी मिल जाती है। ऐसे में सामान्य वर्ग को पढ़ाई से मोहभंग हो जाना चाहिए। लेकिन यह वर्ग अब भी मानने को तैयार नहीं है। मैं तो कहता हूॅं कि काश! सामान्य वर्ग को लावारिस घोषित कर दिया जाता तो पढ़ने पर होने वाले लाखों के खर्च बच जाते। सामान्य वर्ग के लोगों की संख्या 50 प्रतिशत है , इस देश में , लेकिन 14 प्रतिशत में सम्पूर्ण देश के लोग कतार बद्ध है। जबकि 86 प्रतिशत पद आरक्षित है।
ऐसे में मैं तो कहता हूॅं कि इस वर्ग को नौकरी नहीं मिलनी चाहिए, इसके लिए संविधान में एक कानून बन जानी चाहिए। इस वर्ग के लोगों को इस आने वाले कानून का कद्र भी करने की अभी से ही प्रयास तेज कर देना चाहिए। वैसे तो यह मेरी निजी व्यथा है। लेकिन इस वर्ग के लोगों की सहानभूति हम पर है। अब देखता हूॅं कि कब सामान्य वर्ग लावारिस वर्ग की श्रेणी में आता है।

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