जयन्तीः आखिर कौन सहेजेगा आरसी साहित्य…?

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Description

महाकवि आरसी प्रसाद सिंह की आज जयन्ती है। हिन्दी व मैथिली साहित्य में उनकी लेखनी को साहित्य जगत से मान्यता प्राप्त है। उनके रचित साहित्य को सहेजने की आज जरूरत है। आखिर इसे सहेजने का कार्य कौन करेगा? यह बहुत बउ़ा सवाल है। बिहार सरकार के स्तर से इसके लिए कोई प्रयास आजतक नहीं हो सका है। महाकवि आरसी प्रसाद सिंह के पुत्र जबतक जीवित थे, तबतक वे इसे सहेजने का कार्य किया करते थे। उनके पौत्र को यह विरासत में मिली है। लेकिन वे सभी अपना कारोबार करने में लग गये है। इस कारण उनकी लेखनी आज नष्ट होने लगी है। गांव के पं्रबुद्धजनों में पत्रकार संजीव कुमार सिंह कहते है युवाओं को साहित्य से प्रेम नहीं है। सहेजने का कार्य वे स्वयं लेने को तैयार अवश्य है, लेकिन महाकवि आरसी के परिजन के द्वारा इसे हस्तगत नहीं करवाया गया है। ऐसे में हम साहित्यकारों का एक दायित्व बनता है कि वे बिहार सरकार के स्तर से इसे सहेजने की एक मांग करें ताकि उनकी अप्रकाशित रचनाओं को नश्ट होने से बचाया जा सके। उल्लेखनीय है कि
आरसी प्रसाद सिंह का जन्म 19 अगस्त, 1911 को बिहार के समस्तीपुर जिला में रोसड़ा रेलवे स्टेशन से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बागमती नदी के किनारे एक गाँव श्एरौतश् (पूर्व नाम ऐरावत) में हुआ था। यह गाँव महाकवि आरसी प्रसाद सिंह की जन्मभूमि और कर्मभूमि है, इसीलिए इस गाँव को आरसी नगर एरौत भी कहा जाता है। अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद आरसी प्रसाद सिंह की साहित्य लेखन की ओर रुचि बढ़ी। उनकी साहित्यिक रुचि एवं लेखन शैली से प्रभावित होकर रामवृक्ष बेनीपुरी ने उन्हें युवक समाचार पत्र में अवसर प्रदान किया। बेनीपुरी जी उन दिनों युवक के संपादक थे। युवक में प्रकाशित रचनाओं में उन्होंने ऐसे क्रांतिकारी शब्दों का प्रयोग किया था कि तत्कालीन अंग्रेज हुकूमत ने उनके ख़िला़फ गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया था।

राजाश्रय ठुकराना

आरसी प्रसाद सिंह के बारे में पद्मभूषण प्राप्त अमृतलाल नागर ने कहा था कि- उन्हें जब कभी देख लेता हूँ, दिल खुश हो जाता है। आरसी में मुझे प्राचीन साहित्यिक निष्ठा के सहज दर्शन मिलते हैं। अगर आरसी प्रसाद के व्यक्तित्व की बात की जाये तो उन्होंने कभी भी परवशता स्वीकार नहीं की। उम्र भर नियंत्रण के खिलाफ आक्रोश जाहिर करते रहे। चालीस के दशक में जयपुर नरेश महाकवि आरसी को अपने यहाँ राजकवि के रूप में भी सम्मानित करना चाहते थे। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने काफी आग्रह, अनुनय-विनय किया, परंतु आरसी बाबू ने चारणवृत्ति तथा राजाश्रय को ठुकरा दिया। ऐसी थी महाकवि आरसी की शख़्सियत। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र राम कुमार वर्मा, डॉ. धीरेंद्र वर्मा, विष्णु प्रभाकर, शिव मंगल सिंह सुमन, बुद्धिनाथ मिश्र और अज्ञेय समेत कई रचनाकारों ने हिन्दी और मैथिली साहित्य के इस विभूति को सम्मान दिया।हम अपने ग्रामवासियों की ओर से महाकवि आरसी प्रसाद सिंह को श्रद्धासुमन अर्पित करते है।

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