राष्ट्रपति चुनावः धर्म के बाद अब बीजेपी की जात पात की राजनीति

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||आईना समस्तीपुर संपादक संजीव कुमार सिंह की खास रपट||
हिन्दुत्व का ऐजेंडा लेकर देश के पीएम की कुर्सी हथियाने वाली बीजेपी ने राष्ट्रपति चुनाव में जाति कार्ड का पासा फेंककर राजनीति में लम्बे समय से चले आ रहे जाति कार्ड को समाप्त करने की जगह इसे और आगे ले जाने का जो सलीका अपनाया है, वह बीजेपी के लिए ही कांटा साबित होने वाला है। देश की राजनीति किस करवट कब लेगी, यह कह पाना किसी के भी बूते से बाहर की बात है। बीजेपी ने राम मंदिर मुद्दा को लेकर देश की सर्वोच्च कुर्सी प्रधानमंत्री के पद को अपने पक्ष में कर लिया। अब राष्ट्रपति चुनाव में जाति कार्ड खेलकर दलित के सहारे इसे भी हथियाने की कोई भी कसर बांकी नहीं छोड़ी है। क्या सचमुच बीजेपी धर्म की आड़ में अब जाति की राजनीति करने लगी है। यदि हॉं तो यह बीजेपी के लिए खतरनाक होने वाली है। जब उनका अपना वोट बैंक खिसक कर दूसरे दल का दामन थाम लेगा और जिस पराये वोट बैंक को अपना बनाने की कोशिश में लगी है बीजेपी वह अपना बन नहीं सकेगा। इस प्रकार से बीजेपी को अटल के स्वर्णिम इंडिया की तरह मोदी के डिजिटल इंडिया की भद पीट जायेगी। यदि नहीं तो फिर समय रहते बीजेपी को सबक लेकर आगे की रणनीति पर कार्य करनी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि कभी बाह्राण व राजपूत वर्ग के मतदाता कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करते थे। लेकिन मुसलमानों को अपना करने के चक्कर में कांग्रेस ने बाह्राण जाति के वोट बैंक को खिसका लिया। बाद के दिनों में कांग्रेस का मुसलमान ने विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों का दामन थाम लिया और कांग्रेस बेचारी बन गयी।
ठीक उसी प्रकार जब कांग्रेस का दामन छोड़कर बाह्राणों ने बीजेपी का दामन थाम लिया तो उसके साथ चलने वाली राजपूत जाति ने भी बीजेपी का दामन थामने में देरी नहीं की और देश के शीर्ष पद पर बीजेपी ने कब्जा जमा लिया। लेकिन आज बीजेपी पिछड़ा व दलित के चक्कर में अपने रीढ़ बाह्राण एवं राजपूत वोटरों को दरकिनार कर रहीं है। ऐसे में वर्ष 2019 के चुनाव में यदि बाह्राण एवं राजपूतों को इसका अहसास हुआ तो कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखने वाली बीजेपी को अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल के बाद पुनः सत्ता में एक दशक के लिए कांग्रेस का शासन काल लौटने के समय काल को याद करना चाहिए। उस समय भी बीजेपी के वोट बैंक बाह्राण एवं राजपूत ने अग्रेसर होकर वोट नहीं किया और हुआं यूं कि अन्य जाति के मतदाताओं ने कांग्रेस का साथ दिया और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे विद्वान पीएम को कुर्सी से निकाल फेंका। वर्ष 1999 से 2004 के मनमोहन सिंह ने 2014 तक पीएम की कुर्सी को संभाला। कांग्रेस ने जाति कार्ड की जगह सत्ता में 2009 में वापसी के लिए किसान कार्ड खेला था। वर्ष 2008 में किसानों के कर्ज को माफ कर किसानों के दिल अपना स्थान बना लिया और बीजेपी 2009 में जाति कार्ड खेलती रह गयी और काग्रेस वापसी कर गयी। आज देश में उसी समय वाली स्थिति है। लेकिन बीजेपी किसानी कार्ड को ढ़कने के लिए जाति कार्ड खेल रहीं है। कहीं वाजपेयी के स्वर्णिम इंडिया की तरह वर्ष 2019 में मोदी के डिजिटल इंडिया की भी हवा न निकल जाय।

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